इंदिरा गाँधी हवाई अड्डे पर मौजूद ड्यूटी ऑफ़िसर ने मसूद को देख कर कहा, "आप पुर्तगाली तो नहीं लगते." लेकिन जैसे ही मसूद ने कहा मैं गुजराती मूल का हूँ, तो उसने दोबारा बिना उसकी तरफ़ देखे उनके पासपोर्ट पर मोहर लगा दी.
आने के कुछ दिनों के भीतर ही मसूद अज़हर को श्रीनगर की गलियों-कूचों में देखा जाने लगा. भड़कीले भाषण देना और कश्मीर में पृथकतावादी गतिविधियों में शामिल समूहों के बीच उभर रहे मतभेदों में मध्यस्थता करना उनकी ख़ासियत थी.
उनका एक काम और था, कश्मीरी युवाओं को चरमपंथी गतिविधियों की तरफ़ आकृष्ट और प्रेरित करना. उनको अनंतनाग में उस समय गिरफ़्तार किया गया, जब वो अनंतनाग में सज्जाद अफ़गानी के साथ बैठकर एक ऑटो में जा रहे थे.
सेना के जवानों ने उन्हें रोका. ऑटो में सवार दोनों लोग उतरकर भागने लगे, लेकिन जवानों ने उन्हें वहीं पकड़ लिया.
जेल में मसूद अज़हर हमेशा ये शेख़ी बघारते थे कि भारत सरकार उन्हें बहुत दिनों तक अपनी जेल में नहीं रख पाएगी. मसूद के गिरफ़्तार होने के 10 महीनों के भीतर चरमपंथियों ने दिल्ली में कुछ विदेशियों को अग़वा कर उन्हें छोड़ने के बदले मसूद अज़हर की रिहाई की मांग की थी.
ये मुहिम असफल हो गई, क्योंकि उत्तर प्रदेश और दिल्ली पुलिस सहारनपुर से बंधकों को छुड़ाने में सफल हो गई.
एक साल बाद हरकत-उल-अंसार ने फिर कुछ विदेशियों का अपहरण कर उन्हें छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन ये प्रयास भी असफल रहा.
1999 में जम्मू की कोट भलवाल जेल से उन्हें निकालने के लिए सुरंग खोदी गई, लेकिन मसूद अज़हर अपने मोटे शरीर के कारण उसमें फंस गए और पकड़े गये.
कुछ महीनों बाद दिसंबर, 1999 में चरमपंथी एक भारतीय विमान का अपहरण कर कंधार ले गए.
विमान के यात्रियों को छोड़ने के बदले भारत सरकार मसूद अज़हर समेत तीन चरमपंथियों को छोड़ने के लिए तैयार हो गई.
उस समय भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के प्रमुख अमरजीत सिंह दुलत को ख़ासतौर से फ़ारूक़ अब्दुल्ला को मनाने श्रीनगर भेजा गया.
अब्दुल्ला, मुश्ताक अहमद ज़रगर और मसूद अज़हर को छोड़ने के लिए कतई तैयार नहीं थे. दुलत को उन्हें मनाने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा.
ज़रगर को श्रीनगर जेल और मसूद अज़हर को जम्मू की कोट भलवाल जेल से श्रीनगर लाया गया. दोनों को रॉ ने एक छोटे गल्फ़स्ट्रीम जहाज़ में बैठाया गया.
दुलत बताते हैं, "दोनों की आँखों में पट्टी बंधी हुई थी. मेरे जहाज़ में सवार होने से पहले दोनों को जहाज़ के पिछले हिस्से में बैठा दिया गया. जहाज़ के बीच में पर्दा लगा हुआ था. पर्दे के एक तरफ़ मैं बैठा था और दूसरी तरफ़ ज़रगर और मसूद अज़हर."
उन्होंने बताया कि 'टेक ऑफ़' से कुछ सेकेंड पहले सूचना आई कि हमें जल्द से जल्द दिल्ली पहुंचना हैं, क्योंकि विदेश मंत्री जसवंत सिंह हवाई अड्डे पर ही कंधार जाने के लिए हमारा इंतज़ार कर रहे थे.
उन्होंने बताया, "दिल्ली में उतरते ही इन दोनों को जसवंत सिंह के जहाज़ में ले जाया गया जिसमें तीसरा चरमपंथी ओमर शेख़ पहले से ही मौजूद था."
कंधार में मौजूद विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव विवेक काटजू, इंटेलिजेंस ब्यूरो के अजित डोभाल और रॉ के सीडी सहाय सबने एक स्वर से कहा कि कंधार ऐसे शख़्स को भेजा जाए जो ज़रूरत पड़ने पर वहाँ बड़े निर्णय ले सके, क्योंकि यह व्यवहारिक नहीं होगा कि हर फ़ैसले के लिए दिल्ली की तरफ़ देखा जाए.
जब जसवंत सिंह के जहाज़ ने कंधार के हवाई अड्डे पर 'लैंड' किया तो बहुत देर तक तो तालिबान का कोई बंदा उनसे मिलने ही नहीं आया.
जसवंत सिंह जहाज़ में ही बैठ कर उनका इंतज़ार करने लगे. जसवंत सिंह अपनी आत्मकथा 'अ कॉल टु ऑनर - इन सर्विस ऑफ़ एमर्जिंग इंडिया' में लिखते हैं, "बहुत देर बाद वॉकी-टॉकी की आवाज़ गूंजी. परेशान विवेक काटजू ने मेरे पास आ कर पूछा, सर तय करिए कि बंधकों की रिहाई से पहले हम इन चरमपंथियों को छोड़ें या नहीं. मेरे पास इसे मानने के सिवा कोई चारा नहीं था."
वो कहते हैं, "जैसे ही ये तीनों नीचे उतरे, मैंने देखा इनका बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया गया. इनके उतरते ही हमारे जहाज़ की सीढ़ियाँ हटा ली गईं ताकि हम नीचे न उतर सकें. नीचे मौजूद लोग खुशी में चिल्ला रहे थे. आईएसआई वाले इन तीनों चरमपंथियों के रिश्तेदारों को पाकिस्तान से कंधार लाए थे, ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि हमने असली लोगों को ही छोड़ा है. जब उन्हें तसल्ली हो गई कि ये असली लोग हैं, तब जाकर हमारे विमान की सीढ़ी दोबारा उसमें लगाई गई. तब तक अँधेरा घिरने लगा था और ठंड भी बढ़ने लगी थी."
आने के कुछ दिनों के भीतर ही मसूद अज़हर को श्रीनगर की गलियों-कूचों में देखा जाने लगा. भड़कीले भाषण देना और कश्मीर में पृथकतावादी गतिविधियों में शामिल समूहों के बीच उभर रहे मतभेदों में मध्यस्थता करना उनकी ख़ासियत थी.
उनका एक काम और था, कश्मीरी युवाओं को चरमपंथी गतिविधियों की तरफ़ आकृष्ट और प्रेरित करना. उनको अनंतनाग में उस समय गिरफ़्तार किया गया, जब वो अनंतनाग में सज्जाद अफ़गानी के साथ बैठकर एक ऑटो में जा रहे थे.
सेना के जवानों ने उन्हें रोका. ऑटो में सवार दोनों लोग उतरकर भागने लगे, लेकिन जवानों ने उन्हें वहीं पकड़ लिया.
जेल में मसूद अज़हर हमेशा ये शेख़ी बघारते थे कि भारत सरकार उन्हें बहुत दिनों तक अपनी जेल में नहीं रख पाएगी. मसूद के गिरफ़्तार होने के 10 महीनों के भीतर चरमपंथियों ने दिल्ली में कुछ विदेशियों को अग़वा कर उन्हें छोड़ने के बदले मसूद अज़हर की रिहाई की मांग की थी.
ये मुहिम असफल हो गई, क्योंकि उत्तर प्रदेश और दिल्ली पुलिस सहारनपुर से बंधकों को छुड़ाने में सफल हो गई.
एक साल बाद हरकत-उल-अंसार ने फिर कुछ विदेशियों का अपहरण कर उन्हें छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन ये प्रयास भी असफल रहा.
1999 में जम्मू की कोट भलवाल जेल से उन्हें निकालने के लिए सुरंग खोदी गई, लेकिन मसूद अज़हर अपने मोटे शरीर के कारण उसमें फंस गए और पकड़े गये.
कुछ महीनों बाद दिसंबर, 1999 में चरमपंथी एक भारतीय विमान का अपहरण कर कंधार ले गए.
विमान के यात्रियों को छोड़ने के बदले भारत सरकार मसूद अज़हर समेत तीन चरमपंथियों को छोड़ने के लिए तैयार हो गई.
उस समय भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के प्रमुख अमरजीत सिंह दुलत को ख़ासतौर से फ़ारूक़ अब्दुल्ला को मनाने श्रीनगर भेजा गया.
अब्दुल्ला, मुश्ताक अहमद ज़रगर और मसूद अज़हर को छोड़ने के लिए कतई तैयार नहीं थे. दुलत को उन्हें मनाने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा.
ज़रगर को श्रीनगर जेल और मसूद अज़हर को जम्मू की कोट भलवाल जेल से श्रीनगर लाया गया. दोनों को रॉ ने एक छोटे गल्फ़स्ट्रीम जहाज़ में बैठाया गया.
दुलत बताते हैं, "दोनों की आँखों में पट्टी बंधी हुई थी. मेरे जहाज़ में सवार होने से पहले दोनों को जहाज़ के पिछले हिस्से में बैठा दिया गया. जहाज़ के बीच में पर्दा लगा हुआ था. पर्दे के एक तरफ़ मैं बैठा था और दूसरी तरफ़ ज़रगर और मसूद अज़हर."
उन्होंने बताया कि 'टेक ऑफ़' से कुछ सेकेंड पहले सूचना आई कि हमें जल्द से जल्द दिल्ली पहुंचना हैं, क्योंकि विदेश मंत्री जसवंत सिंह हवाई अड्डे पर ही कंधार जाने के लिए हमारा इंतज़ार कर रहे थे.
उन्होंने बताया, "दिल्ली में उतरते ही इन दोनों को जसवंत सिंह के जहाज़ में ले जाया गया जिसमें तीसरा चरमपंथी ओमर शेख़ पहले से ही मौजूद था."
कंधार में मौजूद विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव विवेक काटजू, इंटेलिजेंस ब्यूरो के अजित डोभाल और रॉ के सीडी सहाय सबने एक स्वर से कहा कि कंधार ऐसे शख़्स को भेजा जाए जो ज़रूरत पड़ने पर वहाँ बड़े निर्णय ले सके, क्योंकि यह व्यवहारिक नहीं होगा कि हर फ़ैसले के लिए दिल्ली की तरफ़ देखा जाए.
जब जसवंत सिंह के जहाज़ ने कंधार के हवाई अड्डे पर 'लैंड' किया तो बहुत देर तक तो तालिबान का कोई बंदा उनसे मिलने ही नहीं आया.
जसवंत सिंह जहाज़ में ही बैठ कर उनका इंतज़ार करने लगे. जसवंत सिंह अपनी आत्मकथा 'अ कॉल टु ऑनर - इन सर्विस ऑफ़ एमर्जिंग इंडिया' में लिखते हैं, "बहुत देर बाद वॉकी-टॉकी की आवाज़ गूंजी. परेशान विवेक काटजू ने मेरे पास आ कर पूछा, सर तय करिए कि बंधकों की रिहाई से पहले हम इन चरमपंथियों को छोड़ें या नहीं. मेरे पास इसे मानने के सिवा कोई चारा नहीं था."
वो कहते हैं, "जैसे ही ये तीनों नीचे उतरे, मैंने देखा इनका बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया गया. इनके उतरते ही हमारे जहाज़ की सीढ़ियाँ हटा ली गईं ताकि हम नीचे न उतर सकें. नीचे मौजूद लोग खुशी में चिल्ला रहे थे. आईएसआई वाले इन तीनों चरमपंथियों के रिश्तेदारों को पाकिस्तान से कंधार लाए थे, ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि हमने असली लोगों को ही छोड़ा है. जब उन्हें तसल्ली हो गई कि ये असली लोग हैं, तब जाकर हमारे विमान की सीढ़ी दोबारा उसमें लगाई गई. तब तक अँधेरा घिरने लगा था और ठंड भी बढ़ने लगी थी."
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